चाँद अौर शहर

चाँद की सर्द रौशनी में संगेमरमर के मुजस्सिमों की तरह
बहुत खूबसूरत है ये जहाँ…
लेकिन कुछ मरा मरा सा लगता है

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उस रात बैलकनी में खड़े खड़े
सिगरेट के धुएँ के छल्लों में
चाँद को पकड़ना चाहा था मैनें

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शहर में तो हर रात दीवाली है
हर तरफ नूर छिटका हुअा,
हर शख्स कई बाज़ियाँ लगाता,
हर गली शोरगुल अौर धुआँ सा…
अौर चाँद भी नज़र नही आता

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चाँद अौर शहर

१५ अगस्त

सारी पढ़ाई english medium में करी इसलिए अक्सर independence day कह जाते थे। आख़िर Macaulay के क़ाबिल वंशज जो ठहरे। जब हिंदी वाली मैडम ज़बरदस्ती निबंध लिखवाती थीं या किसी अौर वजह से उस एक विषय में इस विषय का विषय उठ जाता तो स्वतंत्रता दिवस लिखना पड़ता था। लिखना पड़ता था इसलिए बोला कि स्वतंत्रता जैसा मुश्किल शब्द बोलने का हमें कोई शौक नही था…तो सिर्फ लिखा हुआ पढ़ते हुए ही बोलते थे। एक-दो पीढ़ी पुराने लोग ज़्यादातर आज़ादी का दिन बोलते थे…मेरे ख़याल में इसके दो कारण हैं – पहला, कि उस वक़्त के लोग बोलते हुए उर्दू हिंदी में बहुत फर्क नही करते थे अौर दूसरा, कि उन के लिए १९४७ एक पढ़ी हुई तारीख नही एक आखों देखी हक़ीक़त थी इसलिए शायद उन्हे सच में वो आज़ादी का दिन लगता होगा।

लेकिन हमारे लिए इस नए ज़माने के त्यौहार का असली नाम कुछ अौर ही था…१५ अगस्त। 

नही मैं आपको independence day/स्वतंत्रता दिवस/आज़ादी के दिन की तारीख नही याद दिला रहा। हमारे लिए उसका नाम ही “१५ अगस्त” था। अौर एेसा बिलकुल नही है कि हमनें तभी से रंग दिखाने शुरू कर दिये थे अौर किसी political point को साबित करने या एक protest के तौर पे हमने एेसा करना शुरू किया। बस जब भी हिंदी में किसी को इस बारे में बोलते हुए सुना तो ज़्यादातर लोगों के मुँह से १५ अगस्त ही सुना। “१५ अगस्त की छुट्टी”, “१५ अगस्त की तय्यारियाँ”, “१५ अगस्त का फंक्शन” वगैरह।

बचपन भर हम उसे १५ अगस्त बुलाते रहे, स्कूल जाके किसी को झंडा फहराते हुए देख के जन गन मन गाते रहे अौर वही सस्ते वाले मोतीचूर के दो लड्डू खा के खुशी खुशी घर वापस आते रहे। 

( आप में से कुछ लोग अब ज़रा छटपटा से रहे होंगे, क्योंकि मैंने ‘जन गन मन’ लिखा ‘जन गण मन’ नही। इसलिए आपके मन की शांति के लिए थोड़ा tangent पे चलते हैं…आप शायद बचपन से ही बिलकुल शुद्ध उच्चारण करने लगे होंगे पर ज़्यादातर बच्चे ‘गण’ को ‘गन’ ही कहते हैं। बल्कि शायद काफी सारे भारतीय एेसे भी होंगे जो ज़िंदगी भर यही मानते होंगे कि उनका राष्ट्रीय गान ‘जन गन मन’ ही है। अब वापस point पे आते हैं। )

स्कूल की छुट्टी होती थी तो ज़ाहिर सी बात है कि काफी ख़ुशी का दिन होता था, पर कभी कुछ खास सोचा नही कि छुट्टी क्यों मिलती है। मतलब पढ़ाया सिखाया तो काफी गया कि उस दिन हमारे देश को अंग्रेज़ों से आज़ादी मिली थी, पर इस बात का मतलब क्या था ये समझने लायक शायद हमारी समझ थी ही नही। अगर कुछ था तो बस एक सीखी सिखाई अँधी अविकसित सी राष्ट्रवाद की भावना थी शायद। लेकिन शायद १५ अगस्त का असली महत्त्व हमारे लिए यही था कि स्कूल की छुट्टी होती थी।

ख़ैर छोड़िए, बचपन में ज़्यादा घुसे तो घुसते ही चले जाएँगे…क्योकि बचपन की यादें एक लाईन में खड़ी साईकलों जैसी होती हैं, एक गिरती है तो उसके पीछे पीछे सारी गिरती चली जाती हैं। तो बचपन की बातों से आगे बढ़ते हैं अौर वो बात करते हैं जिसके लिए हम ये सारी बातें कर रहे हैं। १५ अगस्त का नाम।

१५ अगस्त को छोड़के जिन तीन नामों का हमने ज़िक्र किया उन तीनों के मायने थोड़े अलग अलग हैं…पर्याय वो सिर्फ इसलिए बने हैं क्योंकि हम उन तीनों का इस्तेमाल एक ही दिन के लिए करते हैं।

अंग्रेज़ी में independence असल में dependence का विलोम है। अौर dependence का सबसे नज़दीकी हिंदी अनुवाद निर्भरता होगा। तो independence का मतलब होगा किसी पे निर्भर ना होना या स्वावलम्बी होना। एक बहुत संकीर्ण से राजनैतिक अर्थ में शायद भारत १९४७ में independent हो गया था, पर अगर इस से थोड़ा ऊपर उठ कर देखें तो शायद दुनिया का कोई भी देश सच में independent नही है। हर देश किसी ना किसी चीज़ के लिए दूसरे देशों पर निर्भर होता है…ख़ासकर के आजकल की ग्लोबलाईज़्ड दुनिया में।

अब हिंदी वाले शब्द की बात करते हैं। ‘स्वतंत्रता’ का इस्तेमाल अक्सर ‘स्वाधीनता’ या ‘आज़ादी’ के अर्थ में होता है लेकिन अगर उसके मूल में घुस के देखें तो स्वतंत्रता का मतलब होगा अपना खुद का तंत्र, अपना खुद का system, framework या mechanism होना। हमारा तंत्र सचमुच हमारा है या नही ये भी चर्चा का विषय हो सकता है,  भारतीय दण्ड संहिता अौर आपराधिक प्रक्रिया संहिता तो हमें सीधे सीधे अंग्रेज़ों से विरासत में ही मिली है अौर हमारी संसदीय प्रणाली भी काफी हद तक ब्रिटिश सिस्टम पर ही आधारित है। लेकिन अगर हमारा तंत्र पूरी तरह से हमारे देश की उपज हो तो भी ये हमारे हित में होगा इसकी कोई गारंटी तो नही है…तो इस बात में खुशियाँ मनाने की क्या बात है? अौर वैसे भी अपना खुद का तंत्र बनाने की खुशियाँ तो हम फौज की परेड देख कर २६ जनवरी को मनाते हैं ना? तो क्या हमें गणतंत्र दिवस को ही स्वतंत्रता दिवस भी कहना चाहिए? मेरे खयाल में १५ अगस्त के लिए ‘स्वाधीनता दिवस’ ‘स्वतंत्रता दिवस’ से बहतर नाम होगा। 

रह गया ‘आज़ादी का दिन’। ये नाम तो सुनकर ही हँसी सी छूट जाती है। इस बात पर मुझे कोई शक नही कि ये लफ्ज़ ‘आज़ादी’ अौर इसके पीछे जो भाव है वो ‘independence’ अौर ‘स्वतंत्रता’ की मामूली सी सांसारिक सी व्यवहारिकता से बहुत ज़्यादा ख़ूबसूरत अौर उन्नत है। लेकिन फिर भी (या शायद इसीलिए) १५ अगस्त १९४७ को जो कुछ भी हुआ उस के लिए इस लफ्ज़ का इस्तेमाल कुछ ग़लत सा लगता है। हाँ हमारे देश में अंग्रेज़ों का राज ख़तम हो गया अौर अपने ही देशवासियों का शासन शुरू। लेकिन क्या हम सचमुच आज़ाद हैं? मुझे तो एेसा बिलकुल नही लगता। आपको लगता हो तो आज़ादी अौर आज़ादी का दिन मुबारक।

मेरे लिए तो १५ अगस्त ही है।

१५ अगस्त

४७ से १५ तक

अंग्रेज़ों को बाहर निकाले
साल ६८ गुज़र गए
लेकिन हम अब भी ग़ुलाम हैं
आक़ा मिल गए हमें नए

चाचाजी के अक्षम वंशज
बेटे बेटी भाई भतीजे
चापलूस से चमचे पिट्ठू
नग्न लालसा के नतीजे

कुछ सरदार के झूठे अनुचर
आत्मघोषित धरम के रक्षक
मिथकों को नव सत्य बताते
बगुला भगत, स्वयं के सेवक

कुछ बाबा के नाम को जपते
ढोंग रचाते अभिनेता
कुछ जेपी, पेरियार की शह में
जातिवाद के विक्रेता

बुद्धिहीन अौर भावहीन से
खोटे मन अधपक्के कच्चे
अपना उल्लू सीधा करते
बापू के नाजायज़ बच्चे

४७ से १५ तक

IIT-M मामला, मोदी, अभिव्यक्ति की आज़ादी अौर जातिवाद

जहाँ तक मुमकिन हो मैं कुछ भी बहुत political post नहीं करना चाहता हूँ। हाँ थोड़ी बहुत politics तो ज़िन्दगी के हर पहलू में घुली-मिली सी हुई है…तो ज़ाहिर है कि कभी कभी कुछ non-political बोलते हुए धीरे से कुछ जाने अनजाने में छूट के निकल जाती है। लेकिन पिछले दिनों IIT-M में जो कुछ भी हुअा अौर जिस तरह से ये मीडिया अौर सोशल मीडिया पर चर्चित हुआ, मुझे लगा कि शायद कुछ political लिख लेना चाहिये।

जितना कुछ इस बारे में लिखा-पढ़ा गया मैं ये मान के चल रहा हूँ कि थोड़ा बहुत तो आपको idea लग ही गया होगा। नही तो अभी गूगल कर लीजिए पता चल जायेगा। मैं बस एक बहुत ही बेसिक से सवाल पूछना चाहता हूँ…मुद्दा आख़िर है क्या?

अब आप सोच रहे होंगे कि अगर मेरे सवाल इतने बेसिक हैं तो मैं लिख क्यों रहा हूँ, खुद गूगल करके पढ़ क्यों नही लेता? ये सवाल मैं अापसे नही पूछ रहा, अपने आप से पूछ रहा हूँ। अौर चाहता हूँ कि आप भी अपने आप से पूछें…क्योंकि हमारे मीडिया ने तो एेसे सवालों के बारे में ज़्यादा सोचना छोड़ दिया है। ये वो जवाब हैं जो मेरे मन में उठे…आप मानना चाहते हैं तो मान लीजिए, लेकिन थोड़ा सोच समझ के मानिए।

क्या ये IIT-M का अान्तरिक मुद्दा है?
एेसा अभी तक मैने बहुत कम लोगों को बोलते हुए सुना है (अौर जो बोल भी रहे हैं, वे IIT-M की autonomy के समर्थक नही अम्बेडकर पेरियार स्टडी सर्कल के विरोधी प्रतीत होते हैं)।
मेरे मन में ये एक बात तो स्पष्ट है…ये कभी आन्तरिक मुद्दा था ही नही। जब घटना शुरू ही होती है मानव संसाधन मंत्रालय को लिखी गयी एक बेनाम चिट्ठी से…तो ये IIT-M का आंतरिक मामला कैसे हो सकता है?

क्या ये मुद्दा भी मोदी बनाम दुनिया जहान के चश्मे से देखा जाना चाहिये?
काफी लोगों को एेसा लगता है।
आज कल मीडिया (अौर उससे भी ज़्यादा सोशल मीडिया) का चलन कुछ एेसा है कि हर मामला मोदी के नेतृत्व अौर उनकी सरकार की परफॉर्मेन्स पर एक रेफेरॅन्डम बन जाता है (या बना दिया जाता है)। काफी बार उन मुद्दों का ना तो मोदी से कुछ लेना देना होता है ना उनकी सरकार से। लेकिन इस मामले में मोदी का नाम उठाना जायज़ ही नही, लाज़मी है। IIT-M ने जो कार्यवाही करी वो मानव संसाधन मंत्रालय से चिट्ठी मिलने पर करी। मानव संसाधन मंत्रालय ने जो चिट्ठी लिखी वो कुछ बेनाम छात्रों से एक शिकायती चिट्ठी मिलने पर लिखी। उस चिट्ठी में एक शिकायत ये भी थी कि APSC “माननीय प्रधानमंत्री अौर हिंदुअों के ख़िलाफ नफरत पैदा करने की कोशिश” कर रहे हैं। अौर चिट्ठी के साथ जो ‘अापत्तिजनक’ पॅम्फ्लेट है उसमें जो भाग रेखांकित किया गया है वो पूरा का पूरा सरकार विरोधी है। तो मोदी भले ही व्यक्तिगत तौर पे इस मामले से जुड़े ना हों, पर उनका व्यक्तित्व इस मामले का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।

पर ये भी ध्यान में रखना चाहिए कि मोदी कम से कम इस मामले में तो किसी भी अौर भारतीय राजनेता से हटकर नही हैं। मुझे नही लगता कि हमारे देश में किसी भी पार्टी की किसी भी सरकार के किसी भी नेता में आलोचना को सही तरीके से लेने की क्षमता है। इसलिए इस बारे में अौर नही कहूँगा।

क्या ये अभिव्यक्ति की अाज़ादी का मुद्दा है?
काफी लोगों को एेसा भी लगता है।
पर मुझे ऐसा नही लगता। मेरे इस ख़याल के पीछे पहली वजह तो ये है कि हम चाहे कितना भी ट्विटर अौर फेसबुक पर हल्ला मचा लें अौर ख़ुश हो लें, हमारे संविधान ने हमें असली अभिव्यक्ति की अाज़ादी दी ही नही है। भारत का संविधान Article 19(1)(a) में ये हक़ देते ही Article 19(2) के ज़रिये से हमसे छीन लेता है। (ये स्तिथि प्रथम संशोधन के बाद से है।)

दूसरी वजह ये है कि IIT ने APSC को केवल ‘Derecognize’ किया है…बैन नही। मैं जानता हूँ कि ज़्यादातर मीडिया इसे एक बैन के रूप में ही रिपोर्ट कर रहा था, पर वो इसलिये था कि बैन समझना ज़्यादा आसान है…अौर वैसे भी बहुत ही तकनीकी सा फर्क है। Derecognize का मतलब हुआ कि APSC के सदस्य अब अपनी गतिविधियों के लिए IIT-M के साधन-संसाधन नही इस्तेमाल कर सकते…इसके बाद भी वे आराम से internet पर active हैं, मीडिया से बात कर रहें हैं, अपना पक्ष दुनिया के सामने रख रहें हैं। ये बैन तो हरगिज़ नही है। अौर यदि APSC के पास अभिव्यक्ति की अाज़ादी है, तो IIT-M के पास भी ये अाज़ादी है कि वे किसी भी संगठन से एेतराज़ रखें अौर अपने नाम का उपयोग करने से रोकें। ये फैसला किस वजह से लिया गया, क्या इस ग्रुप अौर दूसरों के लिये दोहरे पैमाने अपनाए गए, क्या APSC के साथ भेदभाव हुआ…ये सब वाजिब सवाल हैं अौर उठाए जाने चाहिए। लेकिन ये सवाल अभिव्यक्ति की अाज़ादी के नही हैं।

जहाँ तक political expression की बात है, वो सभी IITs में उसी तरह दबा कुचला हुआ है जैसे सोशल मीडिया पर भक्तों अौर AAPtards के बीच चंद गिने चुने भूले बिसरे कांग्रेस समर्थक। इस विषय में मैं दो क़िस्से अपने कॉलेज IIT-खड़गपुर के बारे में बताना चाहता हूँ।

पहला मेरे सामने नही हुअा…इसलिये कितना सच है मैं नही जानता। छात्रों के बारे में भी नही है…मेस कर्मचारियों की कहानी है। अापकी जानकारी के लिए बता दूँ कि खड़गपुर बँगाल में है…लेकिन हमारे सभी होस्टल्स में सभी मेस कर्मचारी आँध्र प्रदेश के थे। ये बात हमेशा अजीब लगती थी…फिर कहीं से हमने इस राज़ की कहानी सुनी। कई दशक पहले, साम्यवादी बँगाल में, मेस कर्मचारियों ने यूनिअन बनाकर कुछ मांगें की। जब उनकी बातें नही मानी गई, तो उन सबने वही किया जो यूनिअन वाले करते हैं। हड़ताल। खाली पेट तो छात्र पढ़ते नही, तो उनकी शर्तें मजबूरन माननी पड़ती। लेकिन उस समय के निदेशक ने नया रास्ता निकाला। वे अपने राज्य आँध्र से कई सारे लोगों को बँगाल के इस छोटे से शहर ले आए। Problem solved…यूनिअनबाज़ी ख़तम।

दूसरा किस्सा छात्रों के बारे में है अौर मेरे सामने ही नही, मेरे साथ हुआ था। सन् २००३-४ की बात है। केन्द्र में वाजपेयी सरकार थी, मानव संसाधन मंत्री थे मुरली मनोहर जोशी, बस तभी CAT के पेपर लीक हुए थे अौर शायद पहली बार घोषणा हुई थी कि पूरे देश में १००-१०० IIT अौर IIM बनाए जाएँगे (NDA हो या UPA, ये सिलसिला अब तक जारी है इसलिये पहली बार बोला)। हम कुछ नाटक करने वाले दोस्त IIM Calcutta में एक fest में नुक्कड़ नाटक की प्रतियोगिता में भाग लेने जा रहे थे। मैने एक दोस्त के साथ मिलकर एक नाटक लिखा, जो महाभारत के पात्रों को लेकर, इन सब बातों की कहानी पर आधारित था। बहुत अच्छे से तो अब याद भी नही है, पर मोटी मोटी काहानी कुछ एेसी थी – कौरव अौर पांडव CAT की तय्यारी कर रहे थे…मामा शकुनि दुर्योधन के लिए पेपर लीक करवा देते हैं (मैने खुद दुर्योधन की भूमिका भी निभाई थी)। ये ख़बर आम हो जाती है तो पेपर कैंसल हो जाता है। अब कौरवों को भी एॅडमिशन मिल जाए इसके लिये जोशी पितामह कहते हैं कि १०० भाइयों के लिए १०० IIM खुलवा दिए जाएँ।
नाटक जीता तो नही, लेकिन वहाँ मौजूद एक Times of India के पत्रकार की नज़र में आ गया। उसने हम सब का interview लिया, हम लोग ख़ुश हुए अौर लौट आए। अख़बार में जो छपा, उसमें काफी एेसी बातें भी छपीं जो हमने कभी कहीं नही…जिससे लगा कि हमने केवल एक नुक्कड़ नाटक प्रतियोगिता में भाग नही लिया था, हमने तो सरकार की मुख़ालिफत में जंग छेड़ दी थी। तब कोई सोशल मीडिया तो था नही इसको ‘वायरल’ करने के लिए, तो हम सबने सोचा कि बात खतम हुई।
पर हमें मालूम नही था कि जिस दिन ये खबर छपी, हमारे निदेशक प्रो॰ शिशिर कुमार दूबे दिल्ली में ही मौजूद थे। (उनकी नियुक्ति NDA के शासनकाल में ही हुई थी, अौर ये सुनने को मिलता था कि वे संघ से ताल्लुक रखते थे अौर जोशी जी के करीबी थे।) वहाँ क्या हुआ ये तो हम में से कोई नही जानता, पर जैसे ही प्रो॰ दूबे दिल्ली से लौटे हमारी टीम को Dean of Students’ Affairs ने याद किया। हम लोगों के खिलाफ कोई अनुशासनिक कार्यवाही ना हो इसके लिए हमें लिख कर देना पड़ा कि हम ये नाटक फिर कभी नही खेलेंगे, कि हमारे पास नाटक की कोई लिखित कॉपी नही है, अौर हम माफी माँगते हैं। आज भी इसके बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि हमने ग़लत किया। हमें अपनी अाज़ादी के लिए लड़ना चाहिए था। कभी कभी ये सोच के दिल को ख़ुश कर लेता हूँ कि मैं अगर अकेला होता तो सिस्टम से भिड़ जाता, पर सबकी पढ़ाई अौर भविष्य के साथ थोड़ी खेल सकता था। शायद सबने उस समय यही सोचा हो…या आज भी सोचते होंगे। अब ये IIT-M वाला मामला देख के लगता है कि अगर सोशल मीडिया उस समय भी होता, तो शायद बात कुछ अौर ही हो जाती। ख़ैर…जो बीत गई सो बात गई।

क्या ये जाति का मुद्दा है?
इसमें मुझे दो राय दिखी। काफी लोगों को लगता है कि ये मुद्दा जाति का है नही, पर इसे जाति का मुद्दा बनाया जा रहा है। अौर काफी लोगों का मानना है कि इस मुद्दे की असली जड़ ही जाति है। मेरी जानकारी में पहली राय केवल सवर्ण हिंदुअों की है।
मैं ख़ुद पैदाइश से एक शहरी सवर्ण हिंदू हूँ (वैसे आधा मुसलमान हूँ तो शायद ‘पण्डितों’ की दृष्टि में ‘म्लेच्छ’ ही हूँ ) अौर ज़िन्दगी का काफी बड़ा हिस्सा मैने उन्ही खुशफहमियों में गुज़ारा है जो मुझे अपने आस-पास अधिकतर शहरी सवर्ण हिंदुअों में दिखती हैं। ये सोच की वो धारा है जिसे लगता है कि जाति आज के समाज में खतम हो चुकी है,जो जाति को केवल आरक्षण के ज़रिए समझती है, जिसे लगता है कि SC, ST अौर OBC वाले बिना योग्यता के सवर्णों के मुँह से निवाले छीने जा रहे हैं, जिसे लगता है कि सवर्ण ‘merit’ से सब कुछ पाते हैं अौर दलित ‘privilege’ या ख़ैरात से।

अगर आप सचमुच एेसा मानते हैं, अौर फिर दलितों से शिकायत सुनते हैं कि आज भी दलित का शोषण होता है, भेदभाव अौर छुआछूत ज़िंदा है, सवर्ण हमेशा से दलितों से सब कुछ छीनते आए हैं, अाप सदियों, सहस्राब्दियों से privileged रहे हैं जिसका असर आज भी है तो ज़ाहिर सी बात है कि आप इसे ‘एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी’ टाइप की हरकत मानेंगे।ये दोनों नज़रिए एक दूसरे से इतने अलग हैं, कि इनमें से एक ही सच हो सकता है। या तो शहरी सवर्ण सही हैं, या दलित। मेरी समझ में तो कोई उलझन है नही…दलित सही हैं। पर एक बहुत बड़ी संख्या में लोग एेसा नही मानते हैं।

ये काफी complex बात है, पर मुझे ये अपने education system की एक बहुत बड़ी हार लगती है। हम स्कूल में पढ़ते हैं कि संविधान ने छुआछूत, जात-पात सब खतम कर दिया। फिर घर में जब काम करने वालों को, सफाई करने वालों को दूसरे बर्तन में खाना खिलाते हैं, पानी पिलाते हैं अौर अपने साथ बैठने नही देते तब उसे जाति से जोड़ के देख नही पाते…क्योंकि जाति तो संविधान ने खतम कर दी।

जाति को हम एक प्राचीन प्रथा के रूप में ही देखते हैं, जिसका आज की दुनिया से कोई लेना देना नही। लेकिन जब हम इतिहास भी पढ़ते हैं तो अम्बेडकर को छोड़कर किसी की कोई जाति नही होती…हमें मंगल पांडे के गुणगान सुनाए जाते हैं, कोई ये नही बताता कि पांडे जी छुआछूत का पालन करते थे; शिवाजी की वीरता के बारे में हम पढ़ते हैं, कोई ये नही बताता कि उनके समकालीन ब्राह्मण उन्हे शूद्र मानते थे; किसी दलित या आदिवासी के बारे में तो हम पढ़ते ही नही। मैं ये नही कहना चाहता हूँ कि हमें हर एेतिहासिक शख्सियत को धर्म अौर जाति के तराज़ू में तौल के देखना चाहिए, लेकिन जिस तरह हमने जाति को इतिहास से विलुप्त कर दिया है, वो ग़लत है। जाति अौर जातिवाद एक ऐतिहासिक सच्चाई है जिसे छिपा के हम अपने अतीत (अौर वर्तमान) को ठीक से नही समझ सकते।

हम जाति की एक मनगढ़ंत आदर्श स्तिथि के बारे में पढ़ते सीखते हैं, उसकी सच्चाई के बारे में नही। हमने अम्बेडकर को भी सिकोड़ कर एक छोटे से साँचे में फिट कर लिया है। संविधान का जन्मदाता तो हमें याद है लेकिन Annihilation of Caste के रचयिता को हमने भुला दिया है। हम ये तो बहुत जल्दी बोल पड़ते हैं कि अम्बेडकर अारक्षण के खिलाफ थे, लेकिन ये भूल जाते हैं कि अम्बेडकर सनातन धर्म से भी इत्तेफाक़ नही रखते थे। हम उन्हें देश का पहला कानून मंत्री कह कर अपने मन में इसे जातिवाद का अंत मान लेते हैं, लेकिन ये भूल जाते हैं कि ये महान दलित नेता कभी चुनाव नही जीत पाए…शायद जातिवाद के कारण ही। अम्बेडकर को सम्मान तो हमने दे दिया, पर समझ नही पाए। (अम्बेडकर को दलित नेताअों ने सही समझा एेसा भी मुझे नही लगता, पर उनके बारे में यहाँ कुछ कहना ज़रूरी नही समझता।)

जितना कुछ मैने जाति अौर जातिवाद के बारे में बोल दिया है, उससे ज़्यादा कुछ भी बोलने के शायद मैं योग्य नही हूँ। बस कुछ आखिरी शब्द बोलना चाहता हूँ।

अगर आप सवर्ण हैं – पहले तो ये मत समझिये कि मैं, या कोई अौर, अगर इन मुद्दों को आपके सामने उठाता है तो वो आप पर व्यक्तिगत आरोप लगा रहा है। बिलकुल मुमकिन है कि आप जाति अौर जातिवाद में विश्वास ना रखते हों, लेकिन अगर आप जाति के सत्य को ही नकारते रहेंगे तो आप ना चाहते हुए भी जातिवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। अौर दूसरी बात ये कि जाति को आरक्षण के मुद्दे से अलग करके देखिए। आरक्षण के हमारे system में कमियाँ खामियाँ हो सकती हैं अौर उन्हें सही करना बहुत ज़रूरी है, लेकिन एेसा बिलकुल नही है कि आरक्षण के पीछे जो सोच है वो ही बेबुनियाद है।

अगर आप दलित हैं – आपके पूर्वजों के साथ जो कुछ भी मेरे पूर्वजों ने किया, उसके बारे में जब भी सोचता हूँ शर्मिन्दा हो जाता हूँ। मेरे हिन्दू पूर्वज ठाकुर थे, ज़मींदार राजा महाराजा थे…उनमें से कुछ शायद उदारवादी भी रहे हो, पर अधिकतर ने तो नृशंसता का नेतृत्व ही किया होगा। पर मेरे मुसलमान पूर्वज शायद उनसे भी ज़्यादा बड़े अपराधी हैं…क्योंकि उनका तो धर्म भी उन्हे सिखाता था कि ऊपरवाले के सामने सभी बराबर होते हैं, तब भी उन्होनें जात-पात अौर ऊँच-नीच के इस व्यवहार को ना सिर्फ होने दिया बल्कि उसे खुले दिल से अपनाया भी।

उन सब का किया मैं चाह कर भी बदल तो नही सकता, पर एक चीज़ कर सकता हूँ जो मेरी जानकारी में किसी ने आज तक नही किया है। मैं आज इस ब्लॉग के ज़रिए, अपने पूर्वजों के जाति-सम्बंधी अपराधों के लिए सभी दालितों से अौपचारिक तौर पर माफी माँगता हूँ।

IIT-M मामला, मोदी, अभिव्यक्ति की आज़ादी अौर जातिवाद

नक्सलवाद

की हमने बहुत कोशिश करें आशिक़ी नई सी
निकाला भी दिल का टेंडर, छापे भी इश्तहार।
इक मिल भी गई पार्टी, कर लिया इख़्तियार।
कहा तेरे दिल की तह में दबे हैं कुछ एहसास
आअो इन्हे निकालें, तू मुझसे इनको बाँट
मुझे दे दे तू ये दौलत, इस ग़म से पा निजाद।
तेरे घाव सब सुखा दें, हरे हों या भरे हों
चल खोदें क़िस्से सारे, भले हों या बुरे हों।

मैं चाहता था सचमुच, उसका कहा ही करना
पर दिल में कहीं था तेरा इश्क़ अभी ज़िंदा…
पुरज़ोर फिर चढ़ा वो इस दिल पे हक़ जताने
कितने भी भर लो टेंडर, यादें कहाँ बिकती हैं।
एहसास हैं ये मेरे क्यों दे दूँ इन्हे तुमको?
मत खोदो मेरे क़िस्से, बस ख़ून ही रिसेगा
यलग़ार ये बनी है अब इब्तिदा ग़दर की
इस दिल पे अौर किसी का अब ज़ोर ना चलेगा।

उठा था जवाँ दिलों में उफनता हुअा सा
वो साल दूसरा था, वो हाल दूसरा था।
अब दब के रह गया है ख़्वाहिशों के जंगलों में
कोई रौंदता इधर से, कोई काटता उधर से।
मैं जानता हूँ है ये दुश्मन मेरी ख़ुशी का
पर फिर भी ये लगता है, ये दिल तो था इसी का…
ये जंग-ए-बग़ावत है या हक़ की है लड़ाई
है फैसला कठिन, ये तेरा इश्क़ या नक्सलवाद।

नक्सलवाद

एफ.ए.क्यू

इस ब्लॉग के नाम का क्या मतलब है?

एक मतलब तो काफी ज़ाहिर सा है…काफी बचकाना सा लफ्ज़ों का खेल है। लेकिन मैं ये सोच के अपनेआप को खुश कर लेता हूँ कि इसके पीछे एक और गहरा मतलब छुपा हुआ है। तीन लफ्ज़ हैं…
आज़ाद – स्वच्छन्द, free (स्वतंत्र नहीं कहूँगा, क्योंकि मेरे ख़याल में जहाँ तंत्र आ जाता है वहाँ आज़ादी नहीं रहती।)
इसका यहाँ मतलब है कि मेरे मन में जो भी आएगा मैं लिखूंगा।
हिन्द – भारत, हिंदुस्तान, India…मगर शायद उससे कुछ ज़्यादा, शायद कुछ कम।
इसका मतलब भूगोल से तो है ही लेकिन यहाँ मैं भाषा के लिए इस्तेमाल कर रहा हूँ। क्योंकि हिंदी और उर्दू के दायरों में खुद को बांधना नहीं चाहता, मेरी ज़ुबान ना हिंदी है न उर्दू…या शायद दोनों।
मौज – मज़ा, fun
इसका मतलब समझाना आपको बेवक़ूफ समझना होगा।

ये ब्लॉग क्यों?

लम्बा जवाब ये होगा कि जब स्कूल और वहाँ पढ़ाई जाने वाली हिंदी से पीछा छूटा, कई सालों तक मुड़ के नही देखा। काफी कुछ लिखते रहे लेकिन अंग्रेज़ी में। एक विशेष सोच रखने वाले हमें शायद Macaulay और Marx की औलाद ही कहेंगे। लेकिन सच तो ये है कि बोलचाल की भाषा तो हमेशा यही रही…और काफी लोगों का मानना है कि बातें हम काफी अच्छी बना लेते हैं। तो धीरे धीरे फिर से हिंदी में लिखना शुरू किया। अब लगता है कि अपना लिखा हुआ online रखने का वक्‍त आ गया है। बस इसलिए।

और छोटा जवाब…ऐसे ही।

देवनागरी क्यों?

भई नस्तलीक़ कभी सीख नही पाए…स्कूल ने तीसरी भाषा के नाम पे अधपक्की सी संस्कृत सिखा दी, घर पे किसी ने ज़रूरी नही समझा। वैसे भी अगर नस्तलीक़ में लिख भी पाते तो आप शायद पढ़ ना पाते, क्योंकि आज़ादी के बाद हम सब ने ये मान लिया कि उर्दू सिर्फ मुसलमानों की ज़ुबान है अौर उसकी ऐसी दुर्गत बनाई कि उसे अब सचर कमेटी की रिपोर्ट भी नही बचा सकती।
हाँ रोमन में लिखना काफी आसान भी होता, अौर शायद ज़्यादा लोग पढ़ भी पाते (जी हाँ ऐसे काफी लोग हैं जो हिंदी समझ-बूझ लेते हैं, बोल लेते हैं लेकिन देवनागरी नही पढ़ पाते)। लेकिन रोमन में हिंदी लिखना पास्ता में ज़ीरा-अजवाईन का छौंक लगाने जैसा है…ना इसका मज़ा आता है ना उसका। अौर वैसे भी छूट, छूत अौर *** में अंतर करना भी मुश्किल सा हो जाता है।

यह ब्लाॅग कोई क्यों पढ़े?

कोई कुछ भी क्यों पढ़े? बस वही वजह यहाँ भी है।
वैसे कोई पढ़े ना पढ़े, मुझे कुछ खास फरक नही पड़ता…मैं लिखना चाहता हूँ इसलिये लिख रहा हूँ।

आप वैसे करते क्या हैं?

वैसे तो मैं कुछ खास नही करता। यह ब्लाॅग शुरु किया है, इस के साथ दो अौर ब्लॉग भी हैं…एक अंग्रेज़ी में दुनिया भर की बकवास लिखने के लिए अौर एक कॉमिक्स बनाने के लिए (webcomic कहना ज़्यादा सही रहेगा, क्योंकि art से ज़्यादा satire है)। इसके इलावा कुछ कॉमिक्स लिखे हैं, कुछ online videos में काम करता रहता हूँ, Golden Kela Awards करता हूँ अौर अभी फिल्मों के लिए लिखना शुरू किया है।

आप ‘यह’ की जगह ‘ये’ क्यों लिखते हैं?

असली सवाल ये है कि हमें ‘यह’ लिखना क्यों सिखाया जाता है? बोलते तो हमलोग ‘ये’ ही हैं। बचपन से ये सवाल मेरे मन में रहा है…कभी किसी भी हिंदी टीचर ने कुछ अच्छा जवाब नही दिया। तो मैने सोच लिया कि मैं तो ‘ये’ लिख ही सकता हूँ…जिसे ‘यह’ लिखना हो लिखता रहे। अौर यदि आप ‘यह’ बोलते हो तो क्षमा कीजिएगा।

अौर कुछ?

नही फिलहाल बस इतना ही…

एफ.ए.क्यू